बात उन दिनों की है जब मैं गया में रहता था। मेरे पड़ोसी झा जी जो मगध मेडिकल कॉलेज में नौकरी करते थे। साथ -साथ पुरोहिती भी करते थे। मैं उस वक्त आचार्य चंद्रशेखर मिश्र जो गया के प्रसिद्ध विद्वान हैं, एक भारतीय विद्यापीठ नाम की संस्था चलाते हैं, उसमें नौकरी करता था। नौकरी अजीब तरह की थी। लघु सिद्धांत कौमुदी की अ इ उ न ली लृक रटने की। उस वक्त तक मैं जन्मकुंडली पढ़ लेता हूँ, इसकी जानकारी आस- पड़ोस को हो गयी थी। झा जी हमको बोले," जड़ा मेडिकल चलियेगा, हमारे लेबोरेट्री इंचार्ज कुछ समस्या में हैं। शायद आपसे कुछ समाधान निकले। " उस वक्त मैं लाहिरी पंचांग का सहारा लेता था। जब कहीं निकलता था,जवाहर थैला कंधे पर होता था। जवाहर थैला में सौ साल का पंचांग होता था। जिससे आचार्य जी डरते थे। कहते थे यह थैला आप अपने घर रखकर आयें, विद्यापीठ की भलाई के लिए,इसमें विद्यापीठ विनाषक बम है। मैं था कि मानता नहीं था।
करीब दो बजे मेडिकल के लेबोरेट्री में पहुंचा। लेबोरेट्री इंचार्ज बड़ी वेसब्री से इंतजार कर रहे थे। नाम अब याद नहीं आ रहा, हाँ सिंह जी थे इतना याद है। तब मैं नया -नया था पंडिताई और ज्योतिष गिरी बड़ा डर -डर कर करता था। विद्यापीठ से जुड़ने के बाद छिप -छिपकर भी। क्योंकि आचार्य जी सख्त थे। विद्यापीठ से रोजी-रोजगार की अच्छी व्यवस्था बनी हुई थी।
"आइये पंडित जी, प्रणाम !"
"प्रणाम-प्रणाम !"
"आशीर्वाद दीजिये। "
मगर मेरी आदत नहीं बनी थी उस वक्त तक आशीर्वाद देने की। अभी भी हिचकता हूँ।
उन्होंने एक जनम तिथि बताया। तिथि थी १६ जुलाई १९५३ दिन के ३:०० बजे, बिहार शरीफ में। झोला से पंचांग निकाला। गणना किया। वृश्चिक लग्न की कुंडली थी। तृतीय स्थान में मकर का राहू था, सप्तम में वृष राशि में गुरु और शुक्र थे। मंगल अष्टम में, सूर्य- बुद्ध- केतु भाग्य स्थान में, चन्द्र दशम भवन में सिंह राशि में था और शनि लाभ भवन में कन्या राशि में। मैं उस जातक को २००३ में देख रहा था उस वक्त उस कुंडली में विम्शोत्तरी महादशा के अनुसार वृहस्पति की महादशा में शुक्र की अन्तर्दशा चल रही थी। वृश्चिक लग्न में सप्तम भाव एवं व्यय भाव का स्वामी शुक्र था तथा वृहस्पति दुसरे एवं पांचवें भवन का। कुंडली में सप्तम भवन को प्रथम मारक स्थान माना जाता है एवं दुसरे भवन को द्वितीय मारक स्थान। जब देख रहा था उसी समय में मैं लघुपारासरी की कारिकाओं को गुपचुप तरीके से रट्टा लगा रहा था। उसी में एक कारिका है," केंद्राधिपत्य दोषष्तु बलवान गुरु शुक्रयोः। मारके अपि च तयोर मारक स्थान संस्थितिः। "
अनुमान लगा यह जिस जातक की कुंडली होगी, जरुर वह आफत में होगा। क्योंकि गुरु और शुक्र इस कुंडली में दोनों मारक ग्रह हैं और सप्तम में बैठे हैं।
"तत्काल तो स्थिति ठीक नहीं होगी। " मैंने डरते- डरते निश्चयात्मक अंदाज में बोला।
"हाँ बाबा ! तब क्या होना चाहिए? " इंचार्ज महोदय बोले।
"महामृत्यंजय करा सकते हैं। "
"कब संकल्प लीजियेगा ? "
"शिववास देखकर "
"कब है ?"
"देखता हूँ। "
तिथि निश्चित हुआ। उन्होंने अपने घर बुलाया। मेरा मन एकदम प्रसन्न हो गया। पहली बार अपने दम की एक मोटी कमाई होने वाली थी। मगर उनका घर आचार्य जी के विद्यापीठ की गली में था। बड़ा डर, कैसे जाएँ जजमान के घर ? कहीं भेद न खुल जाये। पत्नी श्री से राय लिया। इनकी अनुमति मिल गया। "अब ल, एकरा में डरे के का बात ? " संध्या के समय हम उनके घर पहुंच गए। दरवाजा खटखटाया।
"आबी पंडित जी। पांव लागी। " एक महिला की आवाज आयी।
सब तैयारी ये लोग करके बैठे हुए थे। उन्हीं महिला की कुंडली थी। बड़ी भद्र थीं, सुशील और शांत। थीं तो श्यामली मगर चेहरे पर कांति थी। मुझे कहीं से कुछ गड़बड़ी दिख ही नहीं रही थी।
" हे भगवान ! बड़ी कृपा है आपकी। "
स्वस्तिवाचन स्रवन , संकल्प , पूजन सब इस मनोयोग से कि मत पूछिये। मानो कोई बिरला भेंटा गया हो।
संकल्प और अग्रिम दक्षिणा लिया तथा चलने को हुआ। आँचल अपना पकड़कर दोनों हाथ से मेरा पांव पखारीं। लगा कि मेरे पांव का सारा दर्द निकल गया। आशीर्वाद को प्रकट करना चाहा, मगर कंठ जबाब दे गया।
तय हुआ था मार्कंडेय महादेव के पास बैठकर जप करने का , अगले दिन अहले सुबह से। सिंह जी गली तक छोड़ने आये। गली में फफक-फफक कर रोने लगे।
"क क क्यों ?"
"बाबा ये नहीं बचेगी। "
"क्या हुआ ? स्वस्थ तो लग रहीं हैं। मैं तो ऐसे ही कुंडली में जो स्थिति थी, उसके अनुसार बता दिया। कुंडली का सबकुछ सही ही थोड़े होता है। बहुत लोग तो ....... "
"ओह बाबा ! क्या बताएं आपको ? इसके मरने का डेट फिक्स हो गया है। इसको ब्लड कैंसर है। हर हप्ते इसका ब्लड चेंज होता है। "
"क्या ?………"हक्का-बक्का गुम। लगा कि पांव तले कि………."तब संकल्प क्यों दिए ? कहीं........ "
"बाबा आप जप कीजिये न, जप हम इसलिए करवा रहे हैं कि इसका परलोक सुधरे। जब ब्लड चेंज होता है तो उसको बड़ी कष्ट की अनुभूति होती है उसमें कुछ कमी हो। आप निश्चिन्त होकर जप कीजिये, दक्षिणा की चिंता मत कीजिये। "
खैर मैं वहां से विदा हो चला घर को। अगले दिन से बैठना था मार्कंडेय महादेव के पास, परलोक सुधारने।
शुभ रात्रि!!
करीब दो बजे मेडिकल के लेबोरेट्री में पहुंचा। लेबोरेट्री इंचार्ज बड़ी वेसब्री से इंतजार कर रहे थे। नाम अब याद नहीं आ रहा, हाँ सिंह जी थे इतना याद है। तब मैं नया -नया था पंडिताई और ज्योतिष गिरी बड़ा डर -डर कर करता था। विद्यापीठ से जुड़ने के बाद छिप -छिपकर भी। क्योंकि आचार्य जी सख्त थे। विद्यापीठ से रोजी-रोजगार की अच्छी व्यवस्था बनी हुई थी।
"आइये पंडित जी, प्रणाम !"
"प्रणाम-प्रणाम !"
"आशीर्वाद दीजिये। "
मगर मेरी आदत नहीं बनी थी उस वक्त तक आशीर्वाद देने की। अभी भी हिचकता हूँ।
उन्होंने एक जनम तिथि बताया। तिथि थी १६ जुलाई १९५३ दिन के ३:०० बजे, बिहार शरीफ में। झोला से पंचांग निकाला। गणना किया। वृश्चिक लग्न की कुंडली थी। तृतीय स्थान में मकर का राहू था, सप्तम में वृष राशि में गुरु और शुक्र थे। मंगल अष्टम में, सूर्य- बुद्ध- केतु भाग्य स्थान में, चन्द्र दशम भवन में सिंह राशि में था और शनि लाभ भवन में कन्या राशि में। मैं उस जातक को २००३ में देख रहा था उस वक्त उस कुंडली में विम्शोत्तरी महादशा के अनुसार वृहस्पति की महादशा में शुक्र की अन्तर्दशा चल रही थी। वृश्चिक लग्न में सप्तम भाव एवं व्यय भाव का स्वामी शुक्र था तथा वृहस्पति दुसरे एवं पांचवें भवन का। कुंडली में सप्तम भवन को प्रथम मारक स्थान माना जाता है एवं दुसरे भवन को द्वितीय मारक स्थान। जब देख रहा था उसी समय में मैं लघुपारासरी की कारिकाओं को गुपचुप तरीके से रट्टा लगा रहा था। उसी में एक कारिका है," केंद्राधिपत्य दोषष्तु बलवान गुरु शुक्रयोः। मारके अपि च तयोर मारक स्थान संस्थितिः। "
अनुमान लगा यह जिस जातक की कुंडली होगी, जरुर वह आफत में होगा। क्योंकि गुरु और शुक्र इस कुंडली में दोनों मारक ग्रह हैं और सप्तम में बैठे हैं।
"तत्काल तो स्थिति ठीक नहीं होगी। " मैंने डरते- डरते निश्चयात्मक अंदाज में बोला।
"हाँ बाबा ! तब क्या होना चाहिए? " इंचार्ज महोदय बोले।
"महामृत्यंजय करा सकते हैं। "
"कब संकल्प लीजियेगा ? "
"शिववास देखकर "
"कब है ?"
"देखता हूँ। "
तिथि निश्चित हुआ। उन्होंने अपने घर बुलाया। मेरा मन एकदम प्रसन्न हो गया। पहली बार अपने दम की एक मोटी कमाई होने वाली थी। मगर उनका घर आचार्य जी के विद्यापीठ की गली में था। बड़ा डर, कैसे जाएँ जजमान के घर ? कहीं भेद न खुल जाये। पत्नी श्री से राय लिया। इनकी अनुमति मिल गया। "अब ल, एकरा में डरे के का बात ? " संध्या के समय हम उनके घर पहुंच गए। दरवाजा खटखटाया।
"आबी पंडित जी। पांव लागी। " एक महिला की आवाज आयी।
सब तैयारी ये लोग करके बैठे हुए थे। उन्हीं महिला की कुंडली थी। बड़ी भद्र थीं, सुशील और शांत। थीं तो श्यामली मगर चेहरे पर कांति थी। मुझे कहीं से कुछ गड़बड़ी दिख ही नहीं रही थी।
" हे भगवान ! बड़ी कृपा है आपकी। "
स्वस्तिवाचन स्रवन , संकल्प , पूजन सब इस मनोयोग से कि मत पूछिये। मानो कोई बिरला भेंटा गया हो।
संकल्प और अग्रिम दक्षिणा लिया तथा चलने को हुआ। आँचल अपना पकड़कर दोनों हाथ से मेरा पांव पखारीं। लगा कि मेरे पांव का सारा दर्द निकल गया। आशीर्वाद को प्रकट करना चाहा, मगर कंठ जबाब दे गया।
तय हुआ था मार्कंडेय महादेव के पास बैठकर जप करने का , अगले दिन अहले सुबह से। सिंह जी गली तक छोड़ने आये। गली में फफक-फफक कर रोने लगे।
"क क क्यों ?"
"बाबा ये नहीं बचेगी। "
"क्या हुआ ? स्वस्थ तो लग रहीं हैं। मैं तो ऐसे ही कुंडली में जो स्थिति थी, उसके अनुसार बता दिया। कुंडली का सबकुछ सही ही थोड़े होता है। बहुत लोग तो ....... "
"ओह बाबा ! क्या बताएं आपको ? इसके मरने का डेट फिक्स हो गया है। इसको ब्लड कैंसर है। हर हप्ते इसका ब्लड चेंज होता है। "
"क्या ?………"हक्का-बक्का गुम। लगा कि पांव तले कि………."तब संकल्प क्यों दिए ? कहीं........ "
"बाबा आप जप कीजिये न, जप हम इसलिए करवा रहे हैं कि इसका परलोक सुधरे। जब ब्लड चेंज होता है तो उसको बड़ी कष्ट की अनुभूति होती है उसमें कुछ कमी हो। आप निश्चिन्त होकर जप कीजिये, दक्षिणा की चिंता मत कीजिये। "
खैर मैं वहां से विदा हो चला घर को। अगले दिन से बैठना था मार्कंडेय महादेव के पास, परलोक सुधारने।
शुभ रात्रि!!