11 October 2013

पुरोहिती

पौरोहित्य कर्म निंदनीय कर्म है। इससे ब्रह्मत्व के तेज का क्षय होता है। - सन्दर्भ भागवत महा पुराण। 
पुरोहिती करते समय पुरोहित का तीन माथा हो जाता है। एक माथा देवता के काम आता है , दूसरा दानवों के और तीसरा मानवों के। तीन माथा के साथ तीन मुंह भी हो जाता है। एक मुंह से सोमपान करता है, दुसरे से मदिरा और तीसरे से अन्न खाता है मजबूरन। अर्थ यह कि पुरोहित वह जो सबको खुश रखे। सिंहासन अथवा इन्द्रासन चाहिए तो पुरोहित की तलाश होती है। संकट से पुरोहित निकालता है। ......... इंद्र का बज्र चलता है, पुरोहित का तीनों सिर कटता है। एक सिर तितर बनता है, दूसरा बटेर और तीसरा गौरैया।

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