17 October 2013

Guru-Shukra

बात उन दिनों की है जब मैं गया में रहता था। मेरे पड़ोसी झा जी जो मगध मेडिकल कॉलेज में नौकरी करते थे। साथ -साथ पुरोहिती भी करते थे। मैं उस वक्त आचार्य चंद्रशेखर मिश्र जो गया के प्रसिद्ध विद्वान हैं, एक भारतीय विद्यापीठ नाम की संस्था चलाते हैं, उसमें नौकरी करता था। नौकरी अजीब तरह की थी। लघु सिद्धांत कौमुदी की अ इ उ न ली लृक रटने की। उस वक्त तक मैं जन्मकुंडली पढ़ लेता हूँ, इसकी जानकारी आस- पड़ोस को हो गयी थी। झा जी हमको बोले," जड़ा मेडिकल चलियेगा, हमारे लेबोरेट्री इंचार्ज कुछ समस्या में हैं। शायद आपसे कुछ समाधान निकले। " उस वक्त मैं लाहिरी पंचांग का सहारा लेता था। जब कहीं निकलता था,जवाहर थैला कंधे पर होता था। जवाहर थैला में सौ साल का पंचांग होता था। जिससे आचार्य जी डरते थे। कहते थे यह थैला आप अपने घर रखकर आयें, विद्यापीठ की भलाई के लिए,इसमें विद्यापीठ विनाषक बम है।  मैं था कि  मानता नहीं था।
            करीब दो बजे मेडिकल के लेबोरेट्री में पहुंचा। लेबोरेट्री इंचार्ज बड़ी वेसब्री से इंतजार कर रहे थे। नाम अब याद नहीं आ रहा, हाँ सिंह जी थे इतना याद है। तब मैं नया -नया था पंडिताई और ज्योतिष गिरी बड़ा डर -डर कर करता था। विद्यापीठ से जुड़ने के बाद छिप -छिपकर भी। क्योंकि आचार्य जी सख्त थे। विद्यापीठ से रोजी-रोजगार की अच्छी व्यवस्था बनी हुई थी।
      "आइये पंडित जी, प्रणाम !"
      "प्रणाम-प्रणाम !"
      "आशीर्वाद दीजिये। "
          मगर मेरी आदत नहीं बनी थी उस वक्त तक आशीर्वाद देने की। अभी भी हिचकता हूँ।
उन्होंने एक जनम तिथि बताया। तिथि थी १६ जुलाई १९५३ दिन के ३:०० बजे, बिहार शरीफ में। झोला से पंचांग निकाला। गणना किया। वृश्चिक लग्न की कुंडली थी। तृतीय स्थान में मकर का राहू था, सप्तम में वृष राशि में गुरु और शुक्र थे। मंगल अष्टम में, सूर्य- बुद्ध- केतु भाग्य स्थान में, चन्द्र दशम भवन में सिंह राशि में था और शनि लाभ भवन में कन्या राशि में।  मैं उस जातक को २००३ में देख  रहा था उस वक्त उस कुंडली में विम्शोत्तरी  महादशा के अनुसार वृहस्पति की महादशा में शुक्र की अन्तर्दशा चल रही थी। वृश्चिक लग्न में सप्तम भाव एवं व्यय भाव  का स्वामी शुक्र था तथा वृहस्पति दुसरे एवं  पांचवें भवन का। कुंडली में सप्तम भवन को प्रथम मारक स्थान माना जाता है एवं दुसरे भवन को द्वितीय मारक स्थान। जब देख रहा था उसी समय में मैं लघुपारासरी की कारिकाओं को गुपचुप तरीके से रट्टा  लगा रहा था। उसी में एक कारिका है," केंद्राधिपत्य दोषष्तु बलवान गुरु शुक्रयोः। मारके अपि च तयोर मारक स्थान संस्थितिः। "
          अनुमान लगा यह जिस जातक की कुंडली होगी, जरुर वह आफत में होगा। क्योंकि गुरु और शुक्र इस कुंडली में दोनों मारक ग्रह हैं और सप्तम में बैठे हैं।
            "तत्काल तो स्थिति ठीक नहीं होगी। " मैंने डरते- डरते निश्चयात्मक अंदाज में बोला।
           "हाँ बाबा ! तब क्या होना चाहिए? " इंचार्ज महोदय बोले।
            "महामृत्यंजय करा सकते हैं। "
             "कब संकल्प लीजियेगा ? "
             "शिववास देखकर "
             "कब है ?"
              "देखता हूँ। "
    तिथि निश्चित हुआ। उन्होंने अपने घर बुलाया। मेरा मन एकदम प्रसन्न हो गया। पहली बार अपने दम की एक मोटी कमाई होने वाली थी। मगर उनका घर आचार्य जी के विद्यापीठ की गली में था। बड़ा डर, कैसे जाएँ जजमान के घर ? कहीं भेद न खुल जाये। पत्नी श्री से राय लिया। इनकी अनुमति मिल गया। "अब ल, एकरा में डरे के का बात ? " संध्या के समय हम उनके घर पहुंच गए। दरवाजा खटखटाया।
            "आबी  पंडित जी। पांव लागी। " एक महिला की  आवाज आयी।
             सब तैयारी ये लोग करके बैठे हुए थे। उन्हीं महिला की कुंडली थी। बड़ी भद्र थीं, सुशील और शांत। थीं तो श्यामली मगर चेहरे पर कांति थी। मुझे कहीं से कुछ गड़बड़ी दिख ही नहीं रही थी।
             " हे भगवान ! बड़ी कृपा है आपकी। "
              स्वस्तिवाचन स्रवन , संकल्प , पूजन सब इस मनोयोग से कि मत पूछिये। मानो कोई बिरला भेंटा गया हो।
               संकल्प और अग्रिम दक्षिणा  लिया तथा चलने को हुआ। आँचल अपना पकड़कर दोनों हाथ से मेरा पांव पखारीं। लगा कि मेरे पांव का सारा दर्द निकल गया। आशीर्वाद को प्रकट करना चाहा, मगर कंठ जबाब दे गया।
                तय हुआ था मार्कंडेय महादेव के पास बैठकर जप करने का , अगले दिन अहले सुबह से। सिंह जी गली तक छोड़ने आये। गली में फफक-फफक कर रोने लगे।
                 "क क क्यों ?"
                  "बाबा ये नहीं बचेगी। "
                   "क्या हुआ ? स्वस्थ तो लग रहीं हैं। मैं तो ऐसे ही कुंडली में जो स्थिति थी, उसके अनुसार बता दिया। कुंडली का सबकुछ सही ही थोड़े होता है। बहुत लोग तो ....... "
                   "ओह बाबा ! क्या बताएं आपको ? इसके मरने का डेट फिक्स हो गया है। इसको ब्लड कैंसर है। हर हप्ते इसका ब्लड चेंज होता है। "
                    "क्या ?………"हक्का-बक्का गुम। लगा कि पांव तले कि………."तब संकल्प क्यों दिए ? कहीं........ "
                    "बाबा आप जप कीजिये न, जप हम इसलिए करवा रहे हैं कि इसका परलोक सुधरे। जब ब्लड चेंज होता है तो उसको बड़ी कष्ट की अनुभूति होती है उसमें कुछ कमी हो। आप निश्चिन्त होकर जप कीजिये, दक्षिणा  की चिंता मत कीजिये। "
                     खैर मैं वहां से विदा हो चला घर को। अगले दिन से बैठना था मार्कंडेय महादेव के पास, परलोक सुधारने।
                       शुभ रात्रि!!

11 October 2013

पंचांग क्या है ?

पंचांग क्या है ? इससे हम -आप सभी परिचित हैं, इसके महत्व को समझते हैं। दैनिक जीवन में इसकी उपयोगिता को समझते हैं। इसके माध्यम से हमें अपने समय का ज्ञान प्राप्त होता है। पंचांग में समय के माप की प्रस्तुति होती है जिससे हमारी गतिविधियों का सञ्चालन होता है। अतः हम समझ सकते हैं कि हमारे समय के मान का पंचांग एक सही और मानक मानदंड है। समय के मापने का यह मानदंड कोई नया नहीं है, इसकी एक लम्बी परंपरा है। कई प्राचीन सभ्यताएँ आकाशीय पिंडो की गतियों का सूक्ष्म अध्ययन करती आयी हैं, जिससे उन्होंने अपने समय की गणना के तरीकों का विकास किया है एवं पंचांगों का निर्माण किया है। प्राचीन -समाज को फसल की बुआई -कटाई और विभिन्न त्योहारों व अनुष्ठानों के लिए सही समय की जानकारी की आवश्यकता होती होगी, इसलिए समय के मापन एवं पंचांगों की अवधारणा सामने आयी होगी, ऐसा लगता है।
हम मगध क्षेत्र के रहनेवाले हैं। हमें यह जानना चाहिए या हम जानते हैं, तो अच्छी बात है कल गणना एवं आकाशीय पिंडों के अध्ययन की इस परंपरा का अंकुरण इस मगध क्षेत्र से ही हुआ है। पटना का खगौल नामक स्थान आर्यभट की आज भी याद दिलाती है। आर्यभट से जब हम परिचित होते हैं, तो लगता है कि पटना का खगौल आर्यभट के काल में बहुत बड़ा खगोलीय अध्ययन का स्थान रहा होगा। आर्यभट ने मात्र २३ वर्ष की अवस्था में शक वर्ष ४२१ (इसवी सन ४९९)में ज्योतिष सिद्धांत के 'आर्यभटीय ' ग्रन्थ की रचना कर ली थी। जो उनके अद्भुत कल्पना वैचित्र्य का द्योतक है। आर्यभट ने ही सबसे पहले कहा कि "पृथ्वी अपने अक्ष पर भ्रमण करती है। ………ग़्रह का क्रम सूर्य केन्द्राभिप्रायिक है। " उनके सूर्य सिद्धान्तिक निरयन वर्ष की लम्बाई ३६५.२५८७५६ दिन है, जो आज के वैज्ञानिक माप से मात्र ३१ मिनट २७ सेकेण्ड अधिक है। इससे हम आर्यभट के द्वारा रखे गए प्रस्थापनाओं को तथा उस समय के अपने समाज को समझ सकते हैं। नालंदा विश्वविद्यालय के खण्डहर को चलकर देखें। देखते -देखते आँसू ढरक आयेंगे। आर्यभट वहीं के उपज थे। नालंदा जैसे शिक्षा केंद्र में रहते हुए आर्यभट का इकाई से अरबों -खरबों तक की अंक लेखन प्रणाली अपने -आप में अद्भुत कल्पना वैचित्र्य का द्योतक है।
आर्यभट के परवर्ती वाराहमिहिर भी मगध के मग द्विज थे। जो अपने पिता से आर्यभटीय प्रभृति ग्रंथों के अद्ययन के बाद आजीविका प्राप्ति के लिए मगध से अवन्ती गए, जहाँ राज्याभूषित वीर विक्रम की राजधानी में समादृत हुए। जो यवन देशीय विद्वानों के भी संपर्क में रहे। वाराहमिहिर का अप्रतिम पांडित्य ज्योतिष के तीनों स्कन्धों (सिद्धांत, संहिता,होरा )में आजतक विद्यमान है। शायद हम यह सभी यही जानते हैं कि न्यूटन ने सर्वप्रथम यह खोज की कि पृथ्वी में गुरुत्वाकर्षण शक्ति है। पर हमें यह भी जानना चाहिए कि शक संवत ४२७ ईसवी सन ५०५ का वह मग द्विज वाराहमिहिर ने ही सर्वप्रथम यह खोज की थी कि पृथ्वी में गुरुत्वाकर्षण शक्ति है।
अनुमानतः ही नहीं प्रत्यक्षतः हम कह सकते हैं कि खगोलीय अध्ययन के क्षेत्र में मगध की भूमिका अविष्कारक की रही है। यह प्रत्यक्ष प्रमाण मिलता है कि यहाँ की संस्कृति विनष्ट होती रही है और नई संस्कृतियों का प्रादुर्भाव होता रहा है। विनष्टीकरण से बचे हुए कुछ दस्तावेजों, धरोहरों या खण्डहरों से ही मगध की महत्ता पर प्रकाश पड़ता है कि "खण्डहर ही बताते हैं,ईमारत कितना बुलन्द होगा। "
आर्यभट को ही लें। ऐसा लगता है आर्यभट कोई पहले खगोलज्ञ नहीं होंगे। हाँ, उनके पहले के प्रमाण लुप्त हो गए होंगे। आर्यभट ने अपने "सूर्य सिद्धांत " में अपने से पूर्व आचार्यों की परंपरा को स्वयं स्वीकार किया है। उन्होंने "मय "नामक राक्षस को जो लंका निवासी थे, जो रावन के श्वसुर और मंदोदरी के पिता थे को प्रथम खगोलज्ञ माना है।
कालज्ञान की वैदिक पद्धति भी प्रचलन में थी। "कालज्ञानं प्रवक्ष्यामि लगधस्य महात्मनः। " कालज्ञान बोधक ज्योतिष शास्त्र का वर्तमान विकसित स्वरूप आचार्य लगध मुनि की देन है। कालान्तर में समस्त ब्रह्मर्षि वेदव्यास ने जिस प्रकार श्रुति, स्मृति, पुराणों की रचना से ज्ञान संरक्षण एवं संवर्धन किया। उसी प्रकार महात्मा लगध ने वेदाङ्ग ज्योतिष की रचना से ज्योतिष शास्त्र की प्रतिष्ठा अक्षुन्य की है। लगधाचार्य गृह वेध करने में कुशल खगोलज्ञ थे। प्राचीन समय में "नलीकावेध " नामक बांस के यन्त्र से भारतीय गणितज्ञ आचार्यों ने ग्रह ज्ञान के अद्भूत चमत्कारिक सिद्धांत उपपन्न किये थे।
यह गहन अध्ययन, मनन, चिंतन और खोज का विषय है। तत्काल यहाँ उतना विस्तार में जाना संभव नहीं है।
यह तो निश्चित समझते हैं कि खगोलीय पंचांग से जुड़ाव पुरे समाज को है। चाहे उसकी समझ सर्वव्यापक हो या न हो। पंचांग की समझ रकने वाले का एक "आवरण" समाज के मानस -पटल पर है। चाहे वह कोई हो, पंचांग अध्येता हो या न हो, यदि वह उस आवरण में समाज के समक्ष प्रस्तुत होता है,चाहे वह पनवारी की अथवा मोदी जी की चाय की दुकान ही क्यों न हो ? एक जनसंवाद से साक्षात्कार होने का खतरा उपस्थित हो जाता है :- "पाँव लगी बाबा जी, एकादशी कहिया हई? " या "ज्युतिया का पारण कब होगा ?" या " असली जन्माष्टमी कहिया है ?"
पंचांग क्या है ? हम ऊपर विचार कर आये हैं। पंचांग खगोलीय विज्ञानं के अध्ययन की एक प्रस्तुति है। जिसमें तिथि -योग -नक्षत्र -करण -लग्न और आकाशीय पिंडों में ग्रहीय स्थिति के निर्धारण की व्यवस्था होती है। जिसका व्यापक वैज्ञानिक स्थानीय महत्व होता है। और समाज अपेक्षा रखती है अपने समक्ष इसके प्रदर्शन की इसके अध्येताओं से। पंचांग देखकर तिथि -योग -नक्षत्र -लग्न ये सब बता दें, यह कोई बहुत बड़ी बात नहीं है, यह सामान्य ज्ञान की बात है. हममे यह समझ भी होनी चाहिए कि हम जिस पंचांग को आधार मानकर समाज के समक्ष अपना निर्णय दे रहे हैं, क्या वह सही है ? या उसमें त्रुटियाँ हैं ? हमारे यहाँ अन्धानुकरण की प्रवृति देखने को मिलती है , कसौटी पर जांचने की नहीं। पंचांग में जो है वह स्वीकार्य है। यह बड़ी गड़बड़ स्थिति है। पंचांग कोई निर्णय ग्रन्थ नहीं है, वल्कि एक गणितीय अध्ययन है।
तब बात आती है ,"इतना समय किसको है ? आज की दुनिया फ़ास्ट है। " जी हाँ, फ़ास्ट है, फास्टफूड की तरह सबकुछ फ़ास्ट हो गया है। जैसे -तैसे जो हो जाये। जल्दी ख़त्म हो सप्तम अध्याय और पंडित जी शंख बजाएं। जय हो श्री सत्यनारायण भगवान की।
मगर फास्टफूड से पेट भी फास्टली अन्वैलेंस होता है। उसी तरह की स्थिति और सन्दर्भों में भी है।
अतः जरुरत है संयम की, साधना की। कम-से -कम जो साधक लगा हुआ है साधना में, उसके सहयोग की , संरक्षण की।

पुरोहिती

पौरोहित्य कर्म निंदनीय कर्म है। इससे ब्रह्मत्व के तेज का क्षय होता है। - सन्दर्भ भागवत महा पुराण। 
पुरोहिती करते समय पुरोहित का तीन माथा हो जाता है। एक माथा देवता के काम आता है , दूसरा दानवों के और तीसरा मानवों के। तीन माथा के साथ तीन मुंह भी हो जाता है। एक मुंह से सोमपान करता है, दुसरे से मदिरा और तीसरे से अन्न खाता है मजबूरन। अर्थ यह कि पुरोहित वह जो सबको खुश रखे। सिंहासन अथवा इन्द्रासन चाहिए तो पुरोहित की तलाश होती है। संकट से पुरोहित निकालता है। ......... इंद्र का बज्र चलता है, पुरोहित का तीनों सिर कटता है। एक सिर तितर बनता है, दूसरा बटेर और तीसरा गौरैया।